Wednesday, February 13, 2013

सात शहीद महान बिहारी सपूत-



                     ११ अगस्त, १९४२ को सचिवालय गोलीकाण्ड बिहार के इतिहास वरन्‌ भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन का एक अविस्मरणीय दिन था । पटना के जिलाधिकारी डब्ल्यू. जी. आर्थर के आदेश पर पुलिस ने गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया । पुलिस ने १३ या १४ राउण्ड गोलियाँ चलाईं, इस गोलीकाण्ड में सात छात्र शहीद हुए, लगभग २५ गम्भीर रूप से घायल हुए । ११ अगस्त, १९४२ के सचिवालय गोलीकाण्ड ने बिहार में आन्दोलन को उग्र कर दिया 

सचिवालय गोलीकाण्ड में शहीद सात महान बिहारी सपूत-

१. उमाकान्त प्रसाद सिंह- राम मोहन राय सेमीनरी स्कूल के १२वीं कक्षा का छात्र था । इसके पिता राजकुमार सिंह थे । वह सारण जिले के नरेन्द्रपुर ग्राम का निवासी था ।

२. रामानन्द सिंह- ये राम मोहन राय सेमीनरी स्कूल पटना के ११ वीं कक्षा का छात्र था । इनका जन्म पटना जिले के ग्राम शहादत नगर में हुआ था । इनके पिता लक्ष्मण सिंह थे ।

३. सतीश प्रसाद झा- सतीश प्रसाद का जन्म भागलपुर जिले के खडहरा में हुआ था । इनके पिता जगदीश प्रसाद झा थे । वह पटना कालेजियत स्कूल का ११वीं कक्षा का छात्र था । सीवान थाना में फुलेना प्रसाद श्रीवास्तव द्वारा राष्ट्रीय झण्डा लहराने की कोशिश में पुलिस गोली का शिकार हुए ।

४. जगपति कुमार- इस महान सपूत का जन्म गया जिले के खराठी गाँव में हुआ था ।

५. देवीपद चौधरी- इस महान सपूत का जन्म सिलहर जिले के अन्तर्गत जमालपुर गाँव में हुआ था । वे मीलर हाईस्कूल के ९वीं कक्षा का छात्र था ।

६. राजेन्द्र सिंह- इस महान सपूत का जन्म सारण जिले के बनवारी चक ग्राम में हुआ था । वह पटना हाईस्कूल के ११वीं का छात्र था ।

७. राय गोविन्द सिंह- इस महान सपूत का जन्म पटना जिले के दशरथ ग्राम में हुआ । वह पुनपुन हाईस्कूल का ११वीं का छात्र था ।

नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आन्दोलन,
साइमन कमीशन वापस जाओ आन्दोलन,
बिहार में स्वराज पार्टी
चौरा-चौरी काण्ड से दुःखी होकर गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन को समाप्त कर दिया फलतः देशबन्धु चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू और विट्‍ठलभाई पटेल ने एक स्वराज दल का गठन किया
असहयोग आन्दोलन
खिलाफत आन्दोलन
होमरूल आन्दोलन
चम्पारण सत्याग्रह आन्दोलन
बिहार में मजदूर आन्दोलन
बिहार में किसानों के समान मजदूरी का भी संगठन बना । बिहार में औद्योगिक मजदूर वर्ग ने मजदूर आन्दोलन चलाया । १९१७ ई. में बोल्शेविक क्रान्ति एवं साम्यवादी विचारों में परिवर्तन के साथ-साथ प्रचार-प्रसार हुआ । दिसम्बर, १९१९ ई. में प्रथम बार जमालपुर (मुंगेर) में मजदूरों की हड़ताल प्रारम्भ हुई । १९२० ई. में एस. एन. हैदर एवं व्यायकेश चक्रवर्ती के मार्गदर्शन में जमशेदपुर वर्क्स एसोसिएशन बनाया गया । १९२५ ई. और १९२८ ई. के बीच मजदूर संगठन की स्थापना हुई । सुभाषचन्द्र बोस, अब्दुल बारी, जयप्रकाश नारायण इसके प्रमुख नेता थे ।
बिहार में संवैधानिक प्रगति और द्वैध शासन प्रणाली
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन एवं नव बिहार प्रान्त के रूप में गठन
रेग्यूलेटिंग एक्ट १७७४ ई. के तहत बिहार के लिए एक प्रान्तीय सभा का गठन किया तथा १८६५ ई. में पटना और गया के जिले अलग-अलग किये गये ।
जून, १९४५ में सरकार ने राजनैतिक गतिरोध को दूर करते हुए एक बार फिर मार्च, १९४६ ई. में बिहार में चुनाव सम्पन्‍न कराया गया । विधानसभा की १५२ सीटों में कांग्रेस को ९८, मुस्लिम लीग को ३४ तथा मोमीन को ५ सीटें मिलीं । ३० मार्च, १९२६ को श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस द्वारा अन्तरिम सरकार का गठन का मुस्लिम लीग ने प्रतिक्रियात्मक जवाब दिया । देश भर में दंगा भड़क उठा जिसका प्रभाव छपरा, बांका, जहानाबाद, मुंगेर जिलों में था । ६ नवम्बर, १९४६ को गाँधी जी ने एक पत्र जारी कर काफी दुःख प्रकट किया । १९ दिसम्बर, १९४६ को सच्चिदानन्द सिंह की अध्यक्षता में भारतीय संविधान सभा का अधिवेशन शुरू हुआ । २० फरवरी, १९४७ में घोषणा की कि ब्रिटिश जून, १९४८ तक भारत छोड़ देगा ।
१४ मार्च, १९४७ को लार्ड माउण्टबेटन भारत के वायसराय बनाये गये । जुलाई, १९४७ को इण्डियन इंडिपेंडेण्ट बिल संसद में प्रस्तुत किया । इस विधान के अनुसार १५ अगस्त, १९४७ से भारत में दि स्वतन्त्र औपनिवेशिक राज्य स्थापित किये जायेंगे । बिहार के प्रथम गवर्नर जयरामदास दौलतराम और मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह बने तथा अनुग्रह नारायण सिंह बिहार के पहले उप मुख्यमंत्री सह वित्त मंत्री बने।
  • २६ जनवरी, १९५० को भारतीय संविधान लागू होने के साथ बिहार भारतीय संघ व्यवस्था के अनुरूप एक राज्य में परिवर्तित हो गया ।
  • १९४७ ई. के बाद भारत में राज्य पुनर्गठन में बिहार को क श्रेणी का राज्य घोषित किया लेकिन १९५६ ई. में राज्य पुनर्गठन अधिनियम के अन्तर्गत इसे पुनः राज्य के वर्ग । में रखा गया ।
  • १५ नवम्बर, २००१ को बिहार को विभाजित कर झारखण्ड और बिहार कर दिया गया ।





बक्सर जेल में बना फंदा पर झुला अफजल


 बक्सर जेल में बना फंदा पर झुला अफजल


आखिरकर बिहार के बक्सर सेंट्रल जेल में बना फांसी का फंदा पर अफजल गुरू को लटका दिया गया ... सुत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक आज से पांच साल पहले अफजल गुरू के लिये बक्सर के सेट्रल जेल में मनीला रस्सी से फांसी का फंदा उसके बजन और लम्बाई को देखते हुऐ वहां के कैदियों के द्वारा बनाया गया था .. दरअसल उस वक्त तिहार जेल के डिप्टी सुप्रिटेंडट फंदें का रिक्यूजिशन लेकर बिहार आये थे जिसके बाद बक्सर जेल में इसका निर्माण किया गया था और फिर उसे लेकर वो तिहार के लिये रवाना हो गये थे .. आधिकारियो से मिली जानारी के मुताबिक देश में मात्र एक जगह मौत का फंदा तैयार होता है। वो जगह कहीं और नहीं बिहार का केन्द्रीय कारा बक्सर है। जी हां यह सच है। इस जेल में बन्द कैदी ही अपने साथियों की मौत का फंदा तैयार करते है। इस विशेष रस्सी का नाम मनीला रस्सी है। 
 
वर्ष 1844 ई. में अंग्रेज शासकों द्वारा केन्द्रीय कारा बक्सर में मौत का फंदा तैयार करने की फैक्ट्री लगाई गई थी। बक्सर केन्द्रीय कारा में तैयार मौत के फंदे से पहली बार सन् 1884 ई. में एक भारतीय नागरिक को फांसी पर लटकाया गया था। वर्तमान समय में देश में जब-जब मौत का फरमान जारी होता है तब-तब केन्द्रीय कारा बक्सर के कैदी ही मौत का फंदा तैयार करते है।
 
अबतक तैयार रस्सी का इतिहास
जेल सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार जेल स्टाफ आनंद शर्मा व शशि कुमार के नेतृत्व में छ: सजायाफ्ता कैदी फांसी देने वाली विशेष प्रकार की मनीला रस्सी का निर्माण करते हैं। राज्य सरकारों की विशेष मांग पर अबतक सन् 1995 ई. में केन्द्रीय कारा भागलपुर, 1981 में महाराष्ट्र, 1990 में पश्चिम बंगाल, 2003 में आंध्रप्रदेश और 2004 में पश्चिम बंगाल को आपूर्ति किया गया।

 
मौत के फंदे का दाम मात्र 182 रूपये

168
किलोग्राम वजन उठाने की क्षमता वाली विशेष प्रकार की रस्सी की कीमत मात्र 182 रूपये है। इस कीमत में बढ़ोतरी अजादी के बाद से नहीं की गई है। अंग्रेजों के जमाने में रूई सुता से इस रस्सी का निर्माण किया जाता था। मनीला रस्सी का निर्माण आज भी पंजाब में उत्पादित होने वाली जे-34 गुणवक्ता वाली रूई के सुतों से किया जाता है जो विशेष आर्दता में तैयार 50 धागों से बना होता है। जिसका वजन 3 किलो 950 ग्राम होने के साथ 60 फीट लम्बा होता है।
 
बक्सर के अलावा मनीला रस्सी तैयार करने पर देश में पूर्ण प्रतिबंध
 
उधोग मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि केन्द्रीय कारा को छोड़ कर भारतीय फैक्ट्री लॉ में इस क्वालिटी की रस्सी के निर्माण पर पूरे देश में पूर्ण प्रतिबंध है। वहीं वरीय प्रशासनिक अधिकारी से प्राप्त जानकारी के अनुसार केवल सरकारी आदेश को छोड़ कर इस विशेष प्रकार के रस्सी के उपयोग पर पूरे देश में पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है।

मनीला नाम कैसे पड़ा...

जेल के अधिकारी के मुताबिक ब्रिटिश हुकूमत में पहले फिलीपीन की राजधानी मनीला में फांसी के लिए रस्सी तैयार होती थी। बाद में बक्सर जेल में भी वैसी ही रस्सी का निर्माण होने लगा। अंग्रेजों ने ही इसे मनीला रस्सी नाम दिया।

Tuesday, February 12, 2013

कुछ न कहने वाली मां....(कविता)

मां
हर पल, दर्द को सहने वाली
जुबां से उफ! न कहने वाली
हर मुश्किल से लड़ने वाली मां!
तू और तेरी ममता बड़ी निराली है.
तन से अपने साट-साटकर
मुझको जीवन देती हो
लाख मारी पैरों को तन पर
उसको हंस-हंस सहती हो
सोचता हूं, कितनी धीरज वाली है मां!
बिस्तर हो गए गिले तो
खुद उस पर सो,
हमे उससे बचाती हो
लगे किसी की नजर न हमको
सीने से लगा हौसला देने वाली है मां!
भूख लगे तो दूध पिलाया
चोट लगी ममता के मरहम लगाती हो
खुद तो भूखे सो जाती
चेहरे पर शिकन नहीं दिखाती हो मां
तू कितनी प्यारी हो!
जिन्दगी की खुशीयां कुर्बान करने वाली है मां!
पौधों सा सींच-सींचकरएक दिन बड़ा बनाती हो
ये कैसी दुनियां की रीत
उम्मीदों की दुनियां में खुद बुढ़ी हो जाती हो
पर!
तेरी ममता हर पल जवां रहने वाली है मां!
दुनियां के कोने-कोने में
 ढूंढ़ा मां की ममता हीं सबसे प्यारी है
ढंूढ़ रहा था मंदिर-मस्जिद में तुझको
घर में बैठी अमृत की प्याली है मां!
हर मुश्किल को सहने वालीजीवन के गुर सीखाती हो
हो गया जब बड़ा लाड्ला
प्यारी सी दुल्हन घर में लाती हो
माथे को चुमकर,उसे भी गले लगाती हो
थक गई तू जो हर मुश्किल को सहने वाली है मां!
खुशीयों का एक बाग सजाकर
फूल रंग-बिरंगे खिलाया था
कैसा अब ये दिन आया
सब आंखों से ओझल हो जाते हैं
कितने दिन की मेहमां,
गम को अंदर पीने वाली है मां!
एक दिन ऐसा भी आया
बुढ़ी हो गई मां उसे भी
अब तेरी जरुरत है
नहीं चाहिए रुपया-पैसा
तेरे ममता की उन्हें जरुरत है
धरती सा धीरज,
कुछ न कहने वाली हैमां !-----------------मुरली मनोहर श्रीवास्तव9430623520/9234929710

कोसी की टीस (कविता)

कोसी की टीस.............................

दूर-दूर तक..
बंजर जमीन है,
रहने को खुली आसमां बेघर लोग हैं....
पूरी जिन्दगी किसी तरह कट गई
लेकिन दर-दर की ठोकर खाता अभिशप्त बुढ़ापा है...
खिलने से पहले
मुरझाता और अपना भटकता बचपन है...
ये वही बाढ़ पीड़ित हैं
जिनके दिलों में आज भी
कोसी के तबाही की टीस है...
न घर-बार ना कोई ठिकाना है
विडंबना के इस मौजूदा चेहरे का,
गरीबी पीछा छोड़ने का तैयार नहीं,
बावजुद इसके अपनी झोपड़पटटी में रहकर
हंसी-खुशी
किसी तरह जीवन के दिन काट रहे हैं.....
इनकी खुशीयों पर कोसी ने ग्रहण लगा दिया
लाखों हो गए बेघर
तो अभागों के लिए सड़क का किनारा,
नहर कि पटरियां हीं आज ठिकाना हो गया है...
दम तोड़ती उम्मीदें नजर आ रही हैं,
कभी लहलहाते खेतों को भी कोसी बहा ले गयी
अब सोना उगलने वाले खेत भी विरान हैं...
कल क्या होगा ?
किसे मालूम,
सब कुछ गंवा चुके
इन बेसहारों की मरघट की तरह जीना जिन्दगी बन गई है....
कोसी प्रलय के महिनों बीत गए
लोगों को मिली विरासत में भुखमरी,
अशिक्षा,कुपोषणऔर क्या कहुं,
कुशहा तटबंध टूटने से
यहां तबाही के निशांआज भी मौजूद हैं....
तबाही का---
आलम क्या था ?
क्या खंडहर !सब बयां कर रहा है.....
चारो ओर पानी हीं पानी है,
यही इन बेचारों की कहानी है,
बोलेंगे ये क्या ?
सब कुछ---इनकी बंद जुबानी है...........

मासूम मुस्कान है (GHAZAL)

गजलजाने कहां तक पहुंचे,उजाले की चाह में
दिन में भी घुप्प अंधेरा है छाने लगा.

तिनका-तिनका चुगकर बसाया आसियां
अब तो उजाले से भी डर लगने लगा.

सबके चेहरे पर, मासूम मुस्कान है
कौन कातिल,कौन है सजा पाने लगा.

चांद पर जा पहुंचने की चाहत है मगर
उड़ान भरने से पहले,कुहरा है छाने लगा.

रोक लो उस आंधी को, जो दहला रही है
किसकी कारगुजारी,किसका दीप बुझने लगा.
------मुरली मनोहर श्रीवास्तव
9430623520, 9304554492

मुझे यूं भूला ना पाओगे


मुझे यूं भूला ना पाओगे
अब बात हिन्दी सिनेमा जगत के सबसे सफल गायक मोण्रफी की। मोहम्मद रफी३ण्एक ऐसा नाम है जिसे शायद ही कोई नहीं जानता। रफ़ी साहब ने अपनी जादुई आवाज के जरिए इंडियन फिल्म इंडस्ट्री को कई दशकों तक हजारों बेहतरीन नगमें दिए। आज इस महान गायक की 25 वीं पुण्यतिथि पर उन्हें याद किया जा रहा है।
तुम मुझे यूं भूला ना पाओगे रफ़ी साहब के ही गाए इस गीत से बेहतर श्रद्धांजली उन्हें भला और क्या होगी। अपने करियर में रफ़ी साहब ने करीब 26 हजार गाने गाए। जिनमें हर रंगए मिजाज और मूड को उन्होनें इस बखूबी से अपनी आवाज में उतारा कि हर कोइ उनकी मखमली आवाज़ का कायल हो गया। चौदवी का चांदण्ण्ण्बाबुल की दुआएं लेती जा जैसे गानों को परदे पर जीवंत करने वाले मोण्रफी एक अच्छे सिंगर होने के साथ एक अच्छे इंसान भी थे।
31 जुलाई 1980 को सुरों के जादूगर कहे जाने वाले इस फंकार की आवाज़ सदा के लिए खामोश हो गई। लेकिन उनके गीत हमेशा के लिए अमर हो गए। 60.70 के दशक में उन्होनें दिलीप कुमारए देवानंदए शम्मी कपूर जैसे कई स्टारों को अपनी आवाज़ के ज़रिए अलग पहचान दिलवाइ। फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें उनके बेहतरीन सिगिंग के लिए पद्मश्री और फिल्मफेयर जैसे कई अवार्डस से भी नवाजा़ गया।
आज भले ही रफी साहब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी आवाज़ का जादु संगीत प्रेमियों के दिलों में कुछ ऐसे बसा है जिसकी गूंज सदियों तक जिंदा रहेगी।

Bismillah Khan Unites Rival Politicians; at least Temporarily

Bismillah Khan Unites Rival Politicians; at least Temporarily
Patna: November 15, 2009

In a rare picture of political togetherness, Chief Minister Nitish Kumar, Independent MP Jagadanand, and noted filmmaker Prakash Jha shared the same platform on Sunday at the release of a book on world-acclaimed Shehnai maestro Bismillah Khan.Highlighting the life story of Khan and his music career that exceeded six decades, Kumar said that the state would honor the Shehnai player at a function next year to mark his birth anniversary.The Chief Minister also pledged to get a park constructed in Patna to honor Khan who, he said, brought joy to millions of people across the globe.The book written by Murli Manohar Srivastava celebrates the life of Khan, his humble beginning, and his contributions to the world of music in a very lucid manner that is certain to interest people of all ages, Kumar said.The event was particularly interesting in the light of reported personal grudges against the three men sharing the same platform.As reported, Jagadanand, the former Rashtriya Janata Dal (RJD) leader, and Nitish Kumar have not spoken to each other in years. Also, Jha, known for his several socially hard-hitting films like Gangajal and Apharan, after sharing friendly relationship with Kumar until he was denied a Janata Dal (U) ticket for the Lok Sabha polls earlier this year, has hardly kept in touch with the Chief Minister after making an unsuccessful bid from Bettiah on a Lok Janshakti Party (LJP) ticket.Kumar, in an attempt to mend ways with both leaders, suggested keeping line of communication open with each other despite political and ideological differences among them. He later invited both to have snacks with him.

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HIMMAT SE KAM LOGE TO ZMANA V SATH DEGA...HO GAYE KAMYAB TO BCHACHA-BCHCHA V NAM LEGA.....MAI EK BAHTE HWA KA JHOKA HU JO BITE PAL YAD DILAUNGA...HMESHA SE CHAHT HAI KI KUCHH NYA KAR GUZRNE KI...MAI DUNIA KI BHID ME KHONA NHI CHAHTA....