Thursday, March 14, 2013

परंपरागत फूलों का बढ़ता बाजार


                      
यूँ तो मधुबनी जिला की पहचान खाद्यान्न और बागवानी खेती के लिए जाना जाता है लेकिन कुछ प्रगितिशील किसानों ने परम्परागत खेती को छोड़ अब फूलों की खेती शुरू कर की है /फूलों की बगिया भी ऐसी की जी रहा ना जाए /फूलों की बगिया में जहां एक ओर परम्परागत फूलों गेंदा गेंदा ,गुलदाउदी ,  दहलिया ,जैसे  की भरमार है  वहीँ बगीचा में विलक्षण नील कमल का पौधा भी मौजूद हैं /जहां 
 एक और परम्परागत खेती के मुकाबले फूलों की खेती से काफी अच्छी आमदनी भी हो रही है /जहां गेंदा गुलाब गुल्दाऔदि ,दहेलिया के पौधों और फूलों की बिक्री से सामान्य आमदनी होती है वहीँ नीलकमल जैसे दुर्लभ पौधों की बिक्री से अच्छी खासी आमदनी होती है /फूलों की खेती से अच्छी आमदनी को देखकर मंगरौनी गाँव के दुसरे किसान और युवक भी ल्फुलों की खेती करना शुरू कर दिया है /अब मधुबनी से सटे मंगरौनी गाँव में फूलों की खेती की और किसान आकर्षित होने लगे हैं /

सिक्की कला


                                     
 
 मधुबनी का  सिक्कि कला बिहार की पुरानी कलाओं में से एक है/इस कला से बने उत्पाद लुभावने होते हैं और आम खरीददार की पहुँच के भीतर है /अब खर पतवार से बने इस अनुपम लोकोपयोगी वस्तुओं को विश्व स्टार पर प्रसिधी प्राप्त हो चुकी है ,हालांकि अन्य कलाओं की तरह इस कालाओं में भी विचौलिये हावी हैं 
 सीक एक प्रकार का खर - पतवार है जो हमारे खेत खलिहानों में उपजाए जाते हैं ,इसी सिक्कि से ऐसीकालाकृति बनती है जिसे देख कर आप दांतों टेल उंगली दबाने को विवश हो जायेंगे /सिक्कि से खूब सूरत हाथी टेबल कोबार दलिया मूर्ति गुलदस्ता सूर्य जैसे सामान ये कलाकार बनाते हैं /इस कला मेंल्बिस वर्ष बिता चुकी सुधा देवी बताती हैं आज भी वह स्वयं को वहीँ पाती है जहां कल थी . इस कला की  कलात्मक वस्तुओं का समुचित बाजार उपलब्ध नहीं     कला  के सिद्धस्त  को भी जीवन की गाडी को  चलाने में काफी 
 मशक्कत करनी पड़ रही है . हालांकि इस कला को सिखने के लिए कलाकारों को कोई  प्रशिक्षण नहीं दिया , इसे कलाकार पीढ़ी -- पीढ़ी अपनी दादी ,नानी से ही सिख लेती हैं /हालांकि सरकारी सहायता के अभाव में ये कलाकार सीजनल कच्चा माल का स्टाक नहीं कर पाती है / सिक्की कला के क्षेत्र में कई कलाकार राष्ट्रीय पुरस्कार पा चुके हैं /फिर भी सरकारी सहायता नहीं मिलने के कारण ठगा सा महसूस करतेहैं और इस ब्यबस्था को कोसते हैं /सिर्फ मधुबनी जिले में सैकड़ो कलाकार सिक्कि कला से जुड़े हुए हैं /कालाकारों की दयनीय स्थिति के और कला को प्रोत्साहन की बाबत सहायक आयुक्त का कहना है कई स्थानों में प्रशिक्षण शिविर लगाए गए हैं साथ ही कलाकारों को विचौलियों से 
 सावधान रहने की बात करते हैं/ बताते चले की जिले में कई एन जी ओ इन कलाकारों के तैयार माल को औने -पौने दामों में खरीद कर मालो मालहो गए हैं  /वहीँ इस कला के क्षेत्रों में जीवन गुजार चुकी कलाकार आज भी दाने -दाने को मोहताज हैं /  सरकारी उपेक्षा और उचित प्रोत्साहन के अभाव में विलुप्त होने के कगार पर पहुँच चूका है अनोखा कला सिक्कि कला /सरकारी सहायता
  एवं बाजार विकसित कर संकट के दौर से गुजर रहे इस कला को बचाया जा सकता है /विदेशी पर्यटक भी इस कला की और आकर्षित हो रहे हैं अगर सरकार इस कला के विकास पर नजर देती है तो सरकार को विदेशी मुद्रा आय के स्रोत में भी वृद्धि होगी.

Wednesday, March 13, 2013

पान के किसान बेहाल


                           मिथिला में पान को सामान का प्रतिक माना  जाता है लेकिन इस वर्ष हुए भीषण शीतलहर और बर्फ बारी ने छीन ली पान की लाली /प्रकृति की मार से किसानों की स्थिति दयनीय हो गयी और वे बिलकुल हताश हैं किसान आर्थिक रूप से पूरी तरह बर्बाद हो गए हैं /

                             मधुबनी जिले भीषण सहित लहर एवं बर्फ़बारी से सैकरों हैक्टेयर में लगे पान की फसल गल गया पान के एके ढुके लक्षी में ही पान  के पत्ते हैं /अधिकांश पौधों में सारे के सहारे सिर्फ पान की सुखी लत्ती ही दिख रही है/ पान की खेती से  जुड़े सैकरों किसान निराश हैं ,इनका  का  हुआ है परेशानी यह है की कर्ज में डूबे ये किसान पुनः अगले वर्ष  कैसे खेती करेंगे  पान को अधिक धुप व तेज पाला से बचाने के लिए चारों और से टाट ,सरई ,और खरही का बेरे लगा कर घेर जाता है /पिछले कई वर्षों से पान के 
किसान आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं /सारे फसल बर्बाद होने के बाबजूद इन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला वही पान के लिए प्रसिद्ध मिथिलांचल के 
लोगों को अब बंगाल के पान से होठों को लाल करना पर रहा है /वही पान के ब्यव्सायियों को बंगाल से पान को मांगा कर बेचना पर रहा है जो काफी महंगा पर रहा है /
                                         
मिथिलांचल के  मधुबनी का पान सारे देश में प्रसिद्ध में प्रसिद्ध है लेकिन ठंढ और सुखार की मार  रहे किसानों को घाटे की खेती होने के कारण 

मधुबनी जिले के किसान पान की खेती से मुह  मोड़ रहे हैं /देखना  है आर्थिक तंगी झेल रहे किसानों को सरकार कोई मुआवजा का प्रावधान करती है या नहीं  

आपसी सौहर्द का प्रतिक है महावर


                  आपसी सौहर्द का प्रतिक है महावर
               * छठ पूजा  इसके बिना रह जाएगा अधूरा 

छठ पूजा पूरे बिहार के साथ बंगाल, पूर्वी उत्तरप्रदेश, नेपाल की तराई के साथ-साथ असम के कुछ भागों में भी मनाया जाता हैं। यह पूजा अब इन इलाकों से बाहर निकलते हुए देश के अन्य भागों में भी होने लगी हैं। इस पूजा के प्रयोग होने वाले पूजा सामग्रीयों की अपनी ही विशेषता होती हैं। छोटी भी पूजा सामग्री अपनी ही विशेषता रखती हैं। इस पूजा में प्रयोग होने वाला महावर का अपना ही महत्व है। गौरतलब है कि महावर सिर्फ डुमरांव में ही बनाया जाता हैं। डुमरांव की चिक टोली में। इस महावर को मुस्लिमों के द्वारा बनाया जाता हैं। भारतीय राजनीतिक दल भले ही अपनी वोट बैंक की राजनीति के लिए हिन्दू मुस्लिमों को अलग कर अपनी राजनीतिक रोटियों को सेकने की कोशिश करे, परंतु इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि जिस प्रकार देव प्रयाग में भागीरथी व अलकनन्दा एक साथ सम्मिलित होकर गंगा नदी का निर्माण करती है गंगा नदी के निर्माण के बाद भागीरथी व अलकनन्दा के जलों को जिस प्रकार अलग नहीं किया जा सकता हैं उसी प्रकार भारतीय सभ्यता और संस्कृति में हिन्दू और मुस्लमान इस प्रकार से घुले-मिले हुए है कि इनको अलग नहीं किया जा सकता हैं। हरेक पूजा पाठ में दोनों कही ना कही एक दूसरे का योगदान करते हैं। महावर बनाने वाली एक मुस्लिम महिला जुबैना खातुन का कहना है कि छठी मईया सबकी है इस लिए महावर बनाते वक्त स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना पड़ता हैं। जानकारों का कहना है कि यह पूजा में अपना अलग ही महत्व रखता है इसके बिना पूजा को पूरा नहीं मना जा सकता हैं। महावर को बनाने के लिए रूई को छोटा-छोटा गोल बनाकर रखा जाता है इसके बाद मैदा या माढ़ के घोल को तैयार किया जाता है इसमें लाल रंग को मिलाया जाता है इस घोल को छोटे-छोटे रूई के टुकड़ो को थाली पर डाला जाता है इसके बाद इनके ऊपर एक तिनका रखा जाता है तिनका इसलिए रखा जाता है कि सुखने के बाद इन्हें आसानी से निकाला जा सके। रूई सुखने के लिए धूप में डाल दिया जाता है। अच्छी तरह से सुख जाने के बाद इनका बंडल बनाकर बाजारों में बेचा जाता हैं। देश के जिन भागों में भी छठ पूजा होती है वहां पर डुमरांव से महावर भेजा जाता हैं। डुमरांव के तकरीबन 30 से 40 परिवार इसे बनाते है इसे मुख्यतः महिलाओं के द्वारा बनाया जाता है। जुबैना खातुन का कहना है कि इस महावर को बनाने में काफी मेहनत लगती है, लेकिन जिस हिसाब से मेहनत होती है उस प्रकार से हमें मेहनताना नहीं मिल पाता हैं। सरकार भी हमारी तरफ कोई ध्यान नहीं देती हैं। जिससे हमलोगों को कोई सरकारी लाभ मिल सके। हमलोग इसे बनाने का कार्य इसलिए करते रहते है जिससे छठी मईया की कृपा हमलोगों पर बनी रहे।
                                                        -नवीन पठक (पत्रकार)


हार में सिनेमा : किसकी चिंता कितनी जायज


                      
                                                                                  - मुरली मनोहर श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकार, पटना

मुंबई में बैठे लोगों से भोजपुरी भाषा के विकास की बात, सुन कर अच्छा लगता है. निश्चित रूप से वे लोग सक्षम हैं भोजपुरी भाषा की विकास करने के लिए. कुछ ऐसे लोग भी हैं बिहार से, जो भोजपुरी भाषा में बन रही फिल्म के विकास को लेकर चिंतित हैं. स्वागत योग्य है यह विचार; लेकिन क्या सिर्फ चिंता व्यक्त कर अखबार में छपने से भोजपुरी भाषा और भोजपुरी फिल्म का विकास हो जायेगा ? एक दूसरे पर दोषारोपण करने से विकास हो जायेगा ?
इस वर्ष भोजपुरी सिमेना के 50 साल पूरे हुए हैं. सिने सोसाइटी पटना और पाटलिपुत्र फ़िल्म्स ऐंड टेलीविजन एकेडमी के संयुक्त प्रयास से पाटलिपुत्र फिल्म ऐंड टेलीविजन एकेडमी के परिसर में 21 फरवरी, 2013 को “भोजपुरी सिनेमा का अतित, वर्तमान और भविष्य” विषय पर संगोष्टी का आयोजन किया गया. इसका पूरा श्रेय सिने सोसाइटी के मीडिया प्रबंधक व पाटलिपुत्र फिल्म्स ऐन्ड टेलीविजन एकेडमी में राइटिंग फैकल्टी रविराज पटेल को जाता है. इस संगोष्ठी में रंगमच और सिनेमा से सम्बन्ध रखनेवाले कुछ प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल हुए और उपरोक्त विषय पर गंभीर चर्चा हुई.
राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने बाज़ार को ध्यान में रखकर सिनेमा बनानेवालों के लिए कहा कि वे चाहते हैं कि ब्रा और बिकनी में नायिकाएं समुन्दर में नहाए, और इस तरह की फिल्म लोग परिवार के साथ जाकर सिनेमा हॉल में देखें. देश और विदेश के लोग जब बिहार आते हैं तो उन्हें भी बिहार में भारत की संस्कृति दिखती है तो क्या यहाँ इस तरह की फिल्म के लिए बिहार में बाज़ार खोजा जा सकता है ?
पाटलिपुत्र फिल्म ऐंड टेलीविजन एकेडमी के निदेशक संतोष प्रसाद ने कहा कि फिल्में न सिर्फ कला, संस्कृति, साहित्य के साथ साथ आज की तकनीकी ज्ञान को दर्शकों तक पहुचाती है;बल्कि उनपर गहरा असर भी डालती है. इसलिए यह ज़रूरी है कि फिल्म निर्माण को सिर्फ कमाई का जरिया न बनाकर मनोरंजन के साथ साथ विकास का वाहक बनाया जाए.
प्रभात खबर, दैनिक जागरण, आज और सन्मार्ग जैसे कुछ अखबारों ने इस खबर को प्राथमिकता दी तो कुछ अखबार ने इसे खबर नहीं माना... प्रभात खबर ने जब यह बात मुंबई में बैठे कुछ लोगों तक पहुंचाई तो उन्हें ऐसा लगा कि कुछ छपने के लिए बोलना चाहिए...और उन्होंने कहा कि 50 साल में भोजपुरी सिनेमा का जितना विकास होना चाहिए था, नहीं हुआ. इसके लिए ज़िम्मेदार अलग अलग लोग हैं. किसी एक के माथे इसका ठीकरा नहीं फोड़ा जा सकता.. इसमें आज की पीढ़ी का नाम ले तो सबसे पहले मनोज तिवारी मृदुल का नाम आता है जो एक लोकगायक से भोजपुरी सिनेमा के चर्चित अभिनेता बने हैं. भोजपुरी सिनेमा ने उन्हें विश्व पटल पर खड़ा किया है, ऐसा उन्होंने कई बार माना है. मारिशस, फिजी से लेकर त्रिनाद, टोबागो तक भोजपुरी का गुणगान गाने के लिए पहुंचे हैं. फ़क्र होता है. लेकिन जब भोजपुरी सिनेमा के विकास के बारे में उनसे बात की जाती है, तो वे इसलिए कुछ नहीं कह पाते क्योंकि वे जानते हैं कि भोजपुरी सिनेमा से पैसा कमाकर क्रिकेट के लिए मैदान बनाने में लग गए हैं.
दुसरे नंबर पर आते है गीतकार, लेखक, अभिनेता, विधायक और निर्माता- निर्देशक विनय बिहारी. इन्हें भोजपुरी गीतकार में सबसे ज्यादा गीत लिखने के लिए लिम्का बुक में नाम दर्ज होने का सौभाग्य मिला है. इन्होने बहुत सारे चर्तित गीत लिखे हैं. भोजपुरी गीतों के पर्याय का नाम है विनय बिहारी. भोजपुरी भाषी लोग इनसे भी नाराज़ रहते हैं और आरोप लगाते हैं कि सत्ता पक्ष में रहते हुए भी भोजपुरी भाषा और भोजपुरी फिल्म के विकास के लिए कुछ ख़ास नहीं किया है. यहाँ तक कहते हैं कि विधान सभा में भोजपुरी सिनेमा के विकास को लेकर एक सवाल तक नहीं करते हैं. सच्चाई कुछ भी हो, वरिष्ठ फिल्म समीक्षक आलोक रंजन के मुताबिक भोजपुरी, भाजिपुरी के दौर से गुज़रते हुए आज भेलपुरी तक पहुँच गई है.
रविकिशन, दिनेश लाल यादव, मोनालिसा, रिंकू घोष, पंखी हेन्गड़े और तमाम युवा कलाकार सिर्फ और सिर्फ पैसे के लिए भोजपुरी फिल्म करते हैं. इसलिए भोजपुरी सिनेमा के विकास के लिए इनका जो योगदान हैं वो सराहनीय है.
देशवा फिल्म के युवा निर्माता निर्देशक नितिन चंद्रा का मानना है कि भोजपुरी भाषा और फिल्म का विकास तभी होगा जब प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक में भोजपुरी भाषा को शामिल किया जाए. क्या भोजपुरी भाषा बोलने और समझने वाले की संख्या कम है ? निश्चित जवाब न में होगा. क्योंकि भारत भर में हिंदी के बाद भोजपुरी ही एक ऐसी भाषा है जिसे सबसे ज्यादा लोग बोलते और समझते हैं.
न्याय के साथ विकास की नारा देनेवाले नितिश कुमार ने पांच छ: साल पहले कहा था कि बिहार में फिल्म निर्माण के लिए अवसर पैदा करेंगे और उन्होंने इसके लिए दो सौ करोड़ रुपये का एक अनुमानित बजट भी रखा था. लेकिन आजतक कुछ नहीं हुआ. क्यों नहीं हुआ इसपर आजतक सब चुप हैं. सरकार भी चुप है क्योंकि महाराष्ट्र में अभी मनसे और शिवसेना के कार्यकर्ता किसी बिहारी को यह कहकर नहीं पीट रहे हैं कि तुम यहाँ फिल्म नहीं बना सकते हो. फिल्म बनानी है तो बिहार जाओ. बिहार में उद्द्योग की भारी कमी है. वितीय वर्ष 2012-2013 में उद्द्योग के लिए करीब बतीस सौ करोड़ रुपये का प्रावधान है. लेकिन फिल्म के लिए बतीस करोड़ भी नहीं है.
फिल्म निर्माण में अब युवा वर्ग अपना भविष्य तलाशने और तराशने लगा है. लेकिन ज़रुरत है अभिभावक को उनका साथ देने की. आज की पीढ़ी लगनशील और कर्मठ है. अगर उनपर भरोसा कर उनका उत्साह बढाया जाए तो निश्चित रूप से आनेवाले समय में युवा पीढ़ी सिनेमा के क्षेत्र में भी सफलता की नयी इबारत लिखेगी.
बिहार हिंदी भाषी राज्य है. साथ में भोजपुरी, मैथिलि, अंगिका, मगही जैसी अन्य क्षेत्रीय भाषाएँ प्रमुखता से बोली और समझी जाती है. इसलिए बिहार में पटना को अगर केंद्र बनाकर इन तमाम बोली और भाषा में फिल्में और धारावाहिक बने तो निश्चित रूप से बिहार में सिनेमा को स्थापित किया जा सकता है. और इसे रोजगार परक भी बनाया जा सकता है.
जी टीवी पर चर्चित धारवाहिक ‘अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो’, अफसर बिटिया, स्टार प्लस पर ‘तेरे मेरे सपने’ कलर्स चैनल पर ‘भाग्यविधाता’ जैसे क्षेत्रीय भाषा में बने धारावाहिको ने साबित कर दिया है कि क्षेत्रीय भाषा में दर्शको को ज्यादा मनोरंजन किया जा सकता है. अगर यह चैनल बिहार से धारावाहिकों को प्रसारित करते तो क्या लोग इसे नहीं देखते ? ज़रुरत है सरकारी और निजी चैनलों को बिहार में अपना कारोबार शुरू करने की, जिससे यहाँ भी सिनेमा और धारावाहिकों के माध्यम से राज्य के विकास को और गति दी जा सके.    

Sunday, February 24, 2013

भोजपुरी सिनेमा का स्वर्णिम वर्षगांठ मना





आज से पचास साल पूर्व उत्तर भारत के लोकप्रिय और मृदुल भाषा ‘भोजपुरी’को पहला सिनेमा “गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ैईबो” के रूप में मिला था. इस फिल्म के निर्माता विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी द्वारा २१ फरवरी १९६३ को पटना के सदाकत आश्रम में भारत के प्रथम राष्ट्रपति व देश रत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद को समर्पित किया गया था. वहीँ उसके अगले दिन यानि २२ फरवरी १९६३ को पटना के वीणा सिनेमा में इस अद्भुत फिल्म का प्रीमियर हुआ था. लिहाजा आज हम स्वर्णिम वर्ष के पड़ाव पर खड़े हैं. इस उपलक्ष में डॉ. प्रसाद को समर्पित किये जाने के ठीक पचास साल पुरे होने पर सिने सोसाइटी ,पटना के मिडिया प्रबंधक रविराज पटेल के सफल नेतृत्व में सिने सोसाइटी , पटना और पाटलिपुत्र फिल्म एंड टेलीविजन एकेडेमी, पटना के संयुक्त तत्वावधान में एक संगोष्ठी आयोजित की गई, जिसका विषय “भोजपुरी सिनेमा के अतीत,वर्तमान और भविष्य” था. इस अवसर पर सिने सोसाइटी ,पटना के अध्यक्ष आर. एन. दास (अवकाशप्राप्त भा.प्र.से.), वरिष्ठ फिल्म पत्रकार आलोक रंजन , अभिनेता डॉ. एन . एन . पाण्डेय , वरिष्ठ फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम , गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ैईबो के फिल्म वितरक वयोवृद्ध आनंदी मंडल , युवा फिल्म निर्देशक नितिन चंद्रा ( मुंबई से वीडियो कोंफ्रेंस के जरिये ),मशहूर कवि आलोक धन्वा , फिल्म संपादक कैप्टन मोहन रावत मुख्य वक्ता थे, जबकि राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त छायाकार प्रो.हेमंत कुमार ने मंच संचालन किया.
अपने उदगार में भारतीय प्रशासनिक सेवा से अवकाश प्राप्त और सिने सोसाइटी,पटना के अध्यक्ष आर. एन. दास ने कहा की ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ैईबो’ के माध्यम से भोजपुरी भाषा को एक नई उर्जा मिली थी. शुरुआत बहुत ही समृद्ध रहा. वर्तमान में भटकाव है, जिसमें बदलाव की आवश्यकता है. श्री दास ने रविराज पटेल द्वारा ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ैईबो’ पर किये गए शोध पर बल देते हुए, उसमें शामिल दुर्लभ जानकारियों से अवगत कराया. श्री पटेल ने इस फिल्म पर एक शोधात्मक पुस्तक लिखी है, जो सिने सोसाइटी के तहत प्रकाशनाधीन है. वहीँ दो दिवसीय आयोजन का श्रेय देते हुए श्री दास ने रविराज पटेल को बधाई देते हुए आभार प्रकट किया.
लगभग तीस वर्षों से मुंबई में फिल्म पत्रकारिता कर रहे अलोक रंजन ने कहा भोजपुरी फिल्म ,भोजपुरी से शुरू हुई, कुछ समय बाद भाजी-पूरी हो गई और अब भेल-पूरी हो गई है. श्री रंजन ने यह भी कहा की भोजपुरी सिनेमा में अश्लीलता का मुख्य कारण भोजपुरी सिनेमा के तथाकथिक निर्माता ,निर्देशक हैं. भोजपुरी में ९० प्रतिशत निर्देशक जाली है. उन्हें सिनेमा के न इतिहास पता है ,न ही भूगोल फिर तो वह जो चीजें बनायें वह गोल मटोल तो होगा ही. इसे बर्बाद करने में फिल्म वितरकों का भी बहुत लम्बा हाथ है. वर्तमान दशक में जो भोजपुरी फिल्मों का बाढ़ आया है ,उसमें एक लम्बा गैप था. मनोज तिवारी एक लोकप्रिय गायक हो चुके थे. प्रयोग के तौर पर “ससुरा बड़ा पैसा वाला” आई ,जिसे एक भोजपुरी गानों का संकलन कहना ज्यादा उचित है.उनके फैन उसे भारी सख्या में देखे और एक कमाउ दौर शुरू हुआ. एक नया ट्रेंड भी शुरू हुआ, भोजपुरी सिनेमा के नायक गायक होने लगे.जबकि यह दौर सिनेमा के आरंभिक समय में था. गायक ही नायक होते थे ,क्यूँ की सिनेमा में पार्श्वगायन की तकनीक मज़बूत नहीं थी. इस क्रम में रवि किशन एक अपवाद है, जो गायक नहीं है.
राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने अपने वक्तव्य में प्रमुखता से इस बात को रखा की आज के भोजपुरी सिनेमा अपने दायरे को समझ ही नहीं पा रहा है. भोजपुरी सिनेमा में यह कतई नहीं होना चाहिए की नायिका बिकनी पहन कर समुंदर किनारे रोमांस कर रही हो. यह भोजपुरी संस्कृती में कभी संभव हो ही नहीं सकता. यह तभी संभव है जब दुनिया जलप्लावल हो जाएगी. दूसरी बात यह की हम भोजपुरी को बिना देखे गाली देते हैं .जिससे मैं सहमत नहीं हूँ. सिनेमा देख कर उस पर आपत्ति जताएं या उसकी निंदा करें.
कई हिंदी व भोजपुरी फिल्मों में अभिनय कर चुके एवं पटना विश्वविद्यालय से भौतकी विभागाध्यक्ष से अवकाशप्राप्त प्रोफ़ेसर डॉ एन एन पाण्डेय ने कहा की वर्तमान भोजपुरी सिनेमा अश्लीलता के दौर से गुजर रहा है. उसके नाम तक सुनने लायक नहीं होते हैं. यहाँ के निर्देशकों में कोई मानदंड नहीं है.
प्रसिद्ध कवि एवं साहित्यकार आलोक धन्वा ने कहा की आज सिनेमा ही साहित्य है, जबकि भाषा एक महानदी है. उसी का एक अंश भोजपुरी सिनेमा भी है. मैं निराशावादी व्यक्ति नहीं हूँ, इसलिए यह उम्मीद करता हूँ की इस भटकाव में बदलाव भी ज़रूर होगी.
मुंबई से विडिओ कांफ्रेंस के जरिये “देसवा” फेम युवा फिल्म निर्देशक नितिन चंद्रा ने अपने संबोधन में कहा की आज हम सच्चा बिहारी रह ही नहीं रह गए हैं .हम अपने संस्कृती से बिलकुल कट चुके हैं.हमारा युवा वर्ग मानसिक तौर पर पलायन कर चूका है . वह रहते तो हैं बिहार के विभिन्न इलाकों में परन्तु अन्दर ही अन्दर वे दिल्ली, पुणे ,मुंबई जैसे मेट्रो सिटी में रचे बसे रहते हैं. वह अपनी मातृभाषा में बात करने से कतराते हैं. अपनी भाषा को वे हीन भावना से देखते हैं. वैसे में कोई भी हमारे संस्कृती के साथ खेलेगा ही. हम उसके लिए आवाज़ नहीं उठाते. अब ऍफ़ एम रेडियो की ही बात लीजिये, पंजाब में पंजाबी गाने बजते हैं, बंगाल में बंगाली गाने , महाराष्ट्र में मराठी जबकि पटना में भोजपुरी , मगही , मैथली ,बज्जिका ,अंगिका छोड़ कर सभी गाने बजते हैं. मैं इसके लिए संघर्ष भी कर रहा हूँ. श्री चंद्रा ने यह भी कहा की बिहार के विभिन्न भाषाई इलाकों में सरकार क्षेत्रीय भाषाओँ की पढाई शुरू करवाए,बचपन से ही उसे अपने धरोहर का पाठ पढाये ,तब जा के हम समझ पाएंगे की हमारी संस्कृती यह ,भाषा यह, तो सिनेमा भी इसी तरह के होने चाहिए. उन्हें जागरूक करने की ज़रूरत है. अच्छे फिल्मों के वितरक नहीं मिलते हैं, यह एक अगल चिंता का विषय है. बिहार में सिनेमा घरों का आभाव है. हमें सभी समस्यों पर आगे आना चाहिए.
सेना व बैंक अधिकारी से अवकाश प्राप्त एवं फिल्म संपादक कैप्टन मोहन रावत ने कहा की आज पटना में सभी तरह के सुविधा उपलब्ध रहने के बाबजूद फिल्मकार यहाँ काम नहीं करते. अगर करते भी है तो एजेंट के माध्यम से गुजरती , मराठी या पंजाबी लोगों के साथ, जिनके अन्दर न बिहार है, न यहाँ की संस्कृती है और न ही भाषा की समझ. कोई पंजाबी आदमी भोजपुरी फिल्म कैसे बना सकता है ? यह संभव ही नही है.उसके अन्दर सिर्फ पैसा चलता है, वह कामुकता को बेच कर पैसे कमाना चाहता है, और वह उसमें सफल भी है.
सन १९६३ में प्रथम भोजपुरी फिल्म “गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ैईबो” के फिल्म वितरक वयोवृद्ध एवं कला मर्मज्ञ आनंदी मंडल ने उस दौर को याद करते हुए कहा की गंगा मैया ...भोजपुरी भाषा ,संस्कृती , सामाजिक विकृति को दूर करने हेतु एक नई दिशा दी थी. लेकिन आज हम उसे भूल चुके हैं. आज हम स्वास्थ्य मनोरंजन के पक्षधर नहीं रह गए हैं.उन्होंने गंगा मैया से जुडी अनेकों यादों को ताज़ा और साझा किया.
वहीँ अनेकों हिंदी भोजपुरी फिल्मों के गीतकार एवं पटकथा , संवाद लेखक विशुद्धानन्द ने कहा की आज भोजपुरी फिल्म उद्योग में भोजपुरी भाषी लोगों का आभाव है. वे अधिकांश भोजपुरी फिल्मों के दृश्यों व गानों के वास्तविक भाव से अलग बताया. उन्होंने यह भी कहा की भोजपुरी में काम करने वाले कलाकारों को भोजपुरी बोलना तक नहीं आता, न उसका मतलब समझते हैं वे. फिर उसका स्वरुप बिगड़ना स्वाभाविक है. इस अवसर पर और कई गणमान्य लोगों ने भी अपना विचार व्यक्त किया.
उक्त कार्यक्रम पटना के पाटलिपुत्र फिल्म्स एंड टेलीविजन एकेडेमी परिसर में संस्कृतीकर्मी युवा शोधार्थी रविराज पटेल के गहन प्रयास पर आयोजित थी.
श्री पटेल का प्रयास सिर्फ वहीँ तक नहीं रहा बल्कि अलगे दिन यानि २२ फरवरी २०१३ को ठीक भोजपुरी सिनेमा के पचास साल पुरे होने के उपलक्ष में सिने सोसाइटी ,पटना एवं बिहार संगीत नाटक आकादमी के सौजन्य से राजधानी पटना के प्रेमचंद रंगशाला में शाम ५ बजे “गंगा मैय तोहे पियरी चढ़ैईबो” का पुनः प्रदर्शन करवाया. इस मौके पर पटना विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. शम्भुनाथ सिंह, प्रभात खबर समाचार पत्र के पटना संस्करण के संपादक स्वयं प्रकाश, बिहार संगीत नाटक आकादमी के सचिव विभा सिन्हा, फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम,अभिनेता डॉ. एन एन पाण्डेय के आलावा पूरा रंगशाला दर्शकों के लबलब रहा. इस अवसर पर पटना विश्वविद्यालय के कुलपति से आर एन दास ने पटना विश्वविद्यालय में नियमित क्लासिक फिल्मों का प्रदर्शन करवाने का आग्रह किया.जिस पर कुलपति ने आश्वाशन भी दिया. फिल्म प्रदर्शन होने के पूर्व गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ैईबो पर शोध कर चुके रविराज पटेल ने प्रथम भोजपुरी सिनेमा कैसे बनी इसके बारे में दर्शकों को संक्षेप में बताया. इस समारोह में मंच संचालन रंगकर्मी कुमार रविकांत कर रहे थे.
फिल्म देखते समय दर्शक भावविभोर थे .वे कभी हंस रहे थे तो कभी रो भी रहे थे. उन्हें यह विश्वास ही नहीं हो रहा था, की वह एक भोजपुरी सिनेमा देख रहे हैं. इस शानदान आयोजन के लिए उपस्थित तमाम गणमान्य लोगों से लेकर आम दर्शकों ने कार्यक्रम संयोजक रविराज पटेल को विशेष बधाई दी.

Wednesday, February 13, 2013

सात शहीद महान बिहारी सपूत-



                     ११ अगस्त, १९४२ को सचिवालय गोलीकाण्ड बिहार के इतिहास वरन्‌ भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन का एक अविस्मरणीय दिन था । पटना के जिलाधिकारी डब्ल्यू. जी. आर्थर के आदेश पर पुलिस ने गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया । पुलिस ने १३ या १४ राउण्ड गोलियाँ चलाईं, इस गोलीकाण्ड में सात छात्र शहीद हुए, लगभग २५ गम्भीर रूप से घायल हुए । ११ अगस्त, १९४२ के सचिवालय गोलीकाण्ड ने बिहार में आन्दोलन को उग्र कर दिया 

सचिवालय गोलीकाण्ड में शहीद सात महान बिहारी सपूत-

१. उमाकान्त प्रसाद सिंह- राम मोहन राय सेमीनरी स्कूल के १२वीं कक्षा का छात्र था । इसके पिता राजकुमार सिंह थे । वह सारण जिले के नरेन्द्रपुर ग्राम का निवासी था ।

२. रामानन्द सिंह- ये राम मोहन राय सेमीनरी स्कूल पटना के ११ वीं कक्षा का छात्र था । इनका जन्म पटना जिले के ग्राम शहादत नगर में हुआ था । इनके पिता लक्ष्मण सिंह थे ।

३. सतीश प्रसाद झा- सतीश प्रसाद का जन्म भागलपुर जिले के खडहरा में हुआ था । इनके पिता जगदीश प्रसाद झा थे । वह पटना कालेजियत स्कूल का ११वीं कक्षा का छात्र था । सीवान थाना में फुलेना प्रसाद श्रीवास्तव द्वारा राष्ट्रीय झण्डा लहराने की कोशिश में पुलिस गोली का शिकार हुए ।

४. जगपति कुमार- इस महान सपूत का जन्म गया जिले के खराठी गाँव में हुआ था ।

५. देवीपद चौधरी- इस महान सपूत का जन्म सिलहर जिले के अन्तर्गत जमालपुर गाँव में हुआ था । वे मीलर हाईस्कूल के ९वीं कक्षा का छात्र था ।

६. राजेन्द्र सिंह- इस महान सपूत का जन्म सारण जिले के बनवारी चक ग्राम में हुआ था । वह पटना हाईस्कूल के ११वीं का छात्र था ।

७. राय गोविन्द सिंह- इस महान सपूत का जन्म पटना जिले के दशरथ ग्राम में हुआ । वह पुनपुन हाईस्कूल का ११वीं का छात्र था ।

नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आन्दोलन,
साइमन कमीशन वापस जाओ आन्दोलन,
बिहार में स्वराज पार्टी
चौरा-चौरी काण्ड से दुःखी होकर गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन को समाप्त कर दिया फलतः देशबन्धु चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू और विट्‍ठलभाई पटेल ने एक स्वराज दल का गठन किया
असहयोग आन्दोलन
खिलाफत आन्दोलन
होमरूल आन्दोलन
चम्पारण सत्याग्रह आन्दोलन
बिहार में मजदूर आन्दोलन
बिहार में किसानों के समान मजदूरी का भी संगठन बना । बिहार में औद्योगिक मजदूर वर्ग ने मजदूर आन्दोलन चलाया । १९१७ ई. में बोल्शेविक क्रान्ति एवं साम्यवादी विचारों में परिवर्तन के साथ-साथ प्रचार-प्रसार हुआ । दिसम्बर, १९१९ ई. में प्रथम बार जमालपुर (मुंगेर) में मजदूरों की हड़ताल प्रारम्भ हुई । १९२० ई. में एस. एन. हैदर एवं व्यायकेश चक्रवर्ती के मार्गदर्शन में जमशेदपुर वर्क्स एसोसिएशन बनाया गया । १९२५ ई. और १९२८ ई. के बीच मजदूर संगठन की स्थापना हुई । सुभाषचन्द्र बोस, अब्दुल बारी, जयप्रकाश नारायण इसके प्रमुख नेता थे ।
बिहार में संवैधानिक प्रगति और द्वैध शासन प्रणाली
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन एवं नव बिहार प्रान्त के रूप में गठन
रेग्यूलेटिंग एक्ट १७७४ ई. के तहत बिहार के लिए एक प्रान्तीय सभा का गठन किया तथा १८६५ ई. में पटना और गया के जिले अलग-अलग किये गये ।
जून, १९४५ में सरकार ने राजनैतिक गतिरोध को दूर करते हुए एक बार फिर मार्च, १९४६ ई. में बिहार में चुनाव सम्पन्‍न कराया गया । विधानसभा की १५२ सीटों में कांग्रेस को ९८, मुस्लिम लीग को ३४ तथा मोमीन को ५ सीटें मिलीं । ३० मार्च, १९२६ को श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस द्वारा अन्तरिम सरकार का गठन का मुस्लिम लीग ने प्रतिक्रियात्मक जवाब दिया । देश भर में दंगा भड़क उठा जिसका प्रभाव छपरा, बांका, जहानाबाद, मुंगेर जिलों में था । ६ नवम्बर, १९४६ को गाँधी जी ने एक पत्र जारी कर काफी दुःख प्रकट किया । १९ दिसम्बर, १९४६ को सच्चिदानन्द सिंह की अध्यक्षता में भारतीय संविधान सभा का अधिवेशन शुरू हुआ । २० फरवरी, १९४७ में घोषणा की कि ब्रिटिश जून, १९४८ तक भारत छोड़ देगा ।
१४ मार्च, १९४७ को लार्ड माउण्टबेटन भारत के वायसराय बनाये गये । जुलाई, १९४७ को इण्डियन इंडिपेंडेण्ट बिल संसद में प्रस्तुत किया । इस विधान के अनुसार १५ अगस्त, १९४७ से भारत में दि स्वतन्त्र औपनिवेशिक राज्य स्थापित किये जायेंगे । बिहार के प्रथम गवर्नर जयरामदास दौलतराम और मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह बने तथा अनुग्रह नारायण सिंह बिहार के पहले उप मुख्यमंत्री सह वित्त मंत्री बने।
  • २६ जनवरी, १९५० को भारतीय संविधान लागू होने के साथ बिहार भारतीय संघ व्यवस्था के अनुरूप एक राज्य में परिवर्तित हो गया ।
  • १९४७ ई. के बाद भारत में राज्य पुनर्गठन में बिहार को क श्रेणी का राज्य घोषित किया लेकिन १९५६ ई. में राज्य पुनर्गठन अधिनियम के अन्तर्गत इसे पुनः राज्य के वर्ग । में रखा गया ।
  • १५ नवम्बर, २००१ को बिहार को विभाजित कर झारखण्ड और बिहार कर दिया गया ।





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HIMMAT SE KAM LOGE TO ZMANA V SATH DEGA...HO GAYE KAMYAB TO BCHACHA-BCHCHA V NAM LEGA.....MAI EK BAHTE HWA KA JHOKA HU JO BITE PAL YAD DILAUNGA...HMESHA SE CHAHT HAI KI KUCHH NYA KAR GUZRNE KI...MAI DUNIA KI BHID ME KHONA NHI CHAHTA....